B. R. Ambedkar Quotes

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B. R. Ambedkar Quotes

“शिक्षित बनिए! संगठित हो जाओ! संघर्ष करे ”

  • सिर्फ़ असंतोष से ही कोई क्रांति सफल नहीं होती. इसके लिए इंसाफ़, सियासी और सामाजिक अधिकारों की ज़रूरत और महत्व में गहरी आस्था ज़रूरी है.

B R Ambedkar

  • महान व्यक्ति और नामी व्यक्ति में फर्क ये है कि महान आदमी समाज का नौकर बनने को तैयार होता है.

B R Ambedkar

  • धर्म और लोगों की परख सामाजिक नैतिकता पर आधारित सामाजिक मानकों के आधार पर होनी चाहिए. अगर धर्म को लोगों के कल्याण के लिए ज़रूरी माना जाता है तो किसी भी मानक का कोई अर्थ नहीं है.

B R Ambedkar

  • मनुष्य के अस्तित्व का आखिरी उद्देश्य होना चाहिए दिमाग का विकास.

B R Ambedkar

  • जो मिल के इस सिद्धांत को मानता है कि एक देश दूसरे देश पर शासन नहीं कर सकता उसे ये भी मानना चाहिए कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन नहीं कर सकता.

B R Ambedkar

  • जहां अर्थशास्त्र और नैतिकता में टकराव होता है, इतिहास गवाह है वहां अर्थशास्त्र की जीत होती है. निहित स्वार्थ तब तक खुद नहीं छोड़े जाते हैं जब तक उन्हें बाध्य करने के लिए ज़रूरी ताकत का इस्तेमाल न किया गया हो.
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  • मुझे वो धर्म पसंद है जो आज़ादी, बराबरी और भाईचारे की शिक्षा दे. 

B R Ambedkar

  • किसी समुदाय की तरक्की को मैं उस तरक्की से मापता हूं जो उस समुदाय की महिलाओं ने हासिल की है.
  • ज़मीर, तर्क और आज़ाद सोच के लिए हिंदू धर्म में कोई जगह नहीं है.
  • भारत के लोग 2 अलग आइडियोलॉजी के हिसाब से चलाए जाते हैं. संविधान की प्रस्तावना में जो सियासी आदर्श मौजूद हैं वो आज़ादी, बराबरी और भाईचारे की बात करते हैं. दूसरी ओर भारतीयों के धर्म में दिए गए सामाजिक आदर्श इनसे इनकार करते हैं.
  • ज़िंदगी लंबी होने के बदले महान होनी चाहिए.
  • विचारों की तरह इन्सान भी नश्वर हैं. किसी आयडिया को उसी तरह फैलाए जाने की ज़रूरत होती है जैसे एक पौधे को पानी की ज़रूरत होती है वरना दोनों ही मर जाते हैं.
  • सियासी ज़ुल्म सामाजिक ज़ुल्म के मुकाबले कुछ नहीं है. समाज को खारिज करने वाला एक सुधारक सरकार को खारिज करने वाले एक नेता से ज्यादा बहादुर है.
  • कानून के द्वारा दी गई स्वतंत्रता से आपका कोई फायदा नहीं होने वाला अगर आप सामाजिक तौर पर स्वतंत्र नहीं हो.
  • पति और पत्नी  का  सम्बन्ध पक्के दोस्तों के जैसा होना चाहिए.
  • अगर हम एक ऐसा भारत चाहते हैं जो संयुक्त हो, एकीकृत हो और आधुनिक हो तो हर धर्म के शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए.
  • इंसान जिस समाज में रहता है उस समाज में उसकी पहचान नहीं खोती. जबकि पानी की एक बूंद सागर में मिलने पर अपनी पहचान खो देती है. मनुष्य का जीवन आज़ाद है. मनुष्य सिर्फ समाज की बेहतरी के लिए पैदा नहीं हुआ बल्कि खुद की तरक्की के लिए पैदा हुआ है.
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